शनिवार, 24 अप्रैल 2010

औरत शरीर एक छलावा

औरत के शरीर में एक अजब-सी कसक होती हैं उसके शरीर की बनावट इस प्रकार होती है कि कोई भी पुरूश उसके यौवन को देखकर उसकी तरफ मोहित हो जाता है। वह उसकी चाह से प्रेम नहीं करता, उसके जिस्म से चाह करने लगता है। उसको, बस जिस्म की चाह रहती है। तो हर पुरूश के बस में होती है।

मैं औरत के शरीर की क्या कल्पना करूं वह एक पुश्प मात्र होती हैं, जो उगती, सालों में कली बनती, फिर इंसान के हाथों कली से फूल का रूप धारण कर लेती है यहीं और के साथ होता है जिसे हर इंसान भोगना चाहता है। पे्रम तो एक बहाना हैं एक धोखा हैं, एक छलावा हैं, एक अनजानी शुरूआत, जिसमें वह चलाता है चलता है चलता ही रहता हैं।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

कुछ कहती है ये फोटो

सेक्स की उम्र कौन तय करे

ये बात सही है कि प्यार करने की उम्र कौन तय करेगा। परिवार, हम, समाज या फिर कुदरतर्षोर्षो ये बहुत चिन्तन का विशय है। लड़के-लड़कियां 12 से 14 साल की आयु में ही प्यार को जानने, समझने लगते हैं। ये सोचे बिना कि क्या सही है और क्या गलत। होता तो प्यार ही है चाहे वो 18-20 वशZ की आयु में हो या कम आयु में, प्यार ही कहलाएगा। अमेरिका में 14, जापान में 15 और भारत में 16 साल की आयु में प्यार कर सकते हैं। ग्रामीण भारत में 12 साल की आयु में ही विवाह कर दिया जाता है, जिसके चलते कम उम्र में लड़की मां बन जाती है। यदि शहरों में 14 साल या 16 साल की उम्र में प्यार/सेक्स कर लिया जाए तो बलात्कार की श्रेणी में आता है। संविधान के तहत लड़की के साथ बलपूर्वक सेक्स करना या फिर लड़की बालिग न हो, तो बलात्कार की श्रेणी में आता है, चाहे लड़की की रज़ामन्दी ही क्यों न हो। क्योंकि, नाबालिग लड़के-लड़कियों में सोचने-समझने, हित-अहित का ज्ञान नहीं होता। ये कानून तय करता है कि समझ है या नहीं। पर समझ होती जरूर है। क्या सही है , क्या गलत- ये तो जानते ही हैं।

अपने आस-पास के माहौल व टेलीविजन में दिखाए जाने वाले सीरियल, फिल्मों आदि में देखकर इनमें भी प्यार करने की भावना इस कदर जागृत होने लगती है कि मैं भी किसी से प्यार करूं या फिर कोई मुझसे भी प्यार करे, इसका नजीता चाहे कुछ भी हो। बहुत हद तक पारिवारिक तनाव, घरवालों से प्यार न मिलना, हमेशा अकेले रहना, प्यार की कमी को पूरा करने के लिए लड़के-लड़कियां प्यार की ओर भागते हैं जिसके परिणाम बहुत ही भयानक भी होते हैं। प्यार के इस खेल में बहुत बार लड़की कम आयु में ही मां बन जाती है और उसे गर्भपात कराना पड़ता है, लड़के-लड़कियां अपनी जान तक भी दे देते हैं। प्यार पाने की चाह में ये अपने घरवालों से, समाज से, दोस्तों से, संगे-संबधियों से भी कट जाते हैं। रह जाते हैं -केवल और केवल अकेले। जो अभी नाबालिग है, वह अभी बच्चों की परवरिश क्या कर सकता है। जब उन्हें अपने भविश्य के बारे में नहीं पता तो वे अपने बच्चोेंेेे के भविश्य के बारे में क्या सोचेंगेर्षोर्षो

परन्तु ,प्यार तो होता ही है । इस पर लाख पहरे क्यों न बिठा दिये जाएं। प्यार तो हो ही जाता है । इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि भारत में प्यार करने पर अब भी पाबन्दी लगी हुई है। इसके बावजूद भी हर 4 में से 3 लड़के - लड़कियां प्यार करते हैं। विदेशों में 12 साल की उम्र में प्यार/सेक्स किया जा सकता है, यदि लड़का-लड़की राजी है तो। वहां प्यार करने की उम्र निर्धारित की जा चुकी है, जिससे वो पढ़ाई के साथ-साथ प्यार व सेक्स की कमी को भी पूरा करते हैं और मानसिक रोगों से मुक्त रहते हैं। भारत में अधिकांश युवा वर्ग मानसिक रोगों की चपेट में हैं। जब शारीरिक परिवर्तन होता है तो सेक्स करने की इच्छा प्रबल होने लगती है। अगर इच्छा की पूर्ति नहीं होती तो हिंसात्मक घटनाओं में वृद्धि होने लगती है। नाबालिग लड़के-लड़कियां मानसिक बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं जिसके कारण से वो आत्म हत्या भी कर लेते हैं।

प्यार करने या सेक्स करने की उम्र का निर्धारण कौन करेगार्षोर्षो इसे शोध का विशय बनाया जा सकता है कि किस उम्र में लड़के -लड़कियां आपस में प्यार/सेक्स बिना किसी रोकटोक के कर सकते हैं र्षोर्षो

आज तो 14 से 16 साल की उम्र में, 4 में से 3 लड़के-लड़कियां सेक्स कर चुके होते हैं, इसका किसी को पता नहीं चलता। यदि समाज की दृिश्ट में लड़की गर्भवती न हो, तब तक किसी को कोई पता नहीं होता। यदि लड़के- लड़कियां इस उम्र में सेक्स करते हैं तो हमें यह मान लेना चाहिए कि उनमें सोचने- समझने की शक्ति भी है।

भारत में पनप रही समलैगिंकता का एक कारण सेक्स पर लगा प्रतिबंध भी हो सकता है। समाज में लगातार फैल रही समलैगिंकता पर काबू पाने के लिए कानून में संशोधन की आवश्यकता है। एक ऐसा कानून पारित किया जाए, जिसमें 14 से 16 वशZ की उम्र में सेक्स करने की अनुमति प्रदान की जाए, जिससे समलैंगिकता, सामाजिक घृणा और संकीर्ण मानसिकता के चंगुल से बचा जा सके। और, युवा पीढ़ी भारत को विकासशील देश से विकसित देश में परिवर्तन करने में सहायक सिद्ध हो।

रविवार, 11 अप्रैल 2010

मृत्यु की सच्चाई

मृत्यु के अलग अलग प्रकार परन्तु रूप एक


मृत्यु इंसान को विभिन्न प्रकार से मारती है

• किसी बीमारी के चलते होने वाली मौत

• दुघटना से होने वाली मौत

• पैदा होते समय हुई मौत

• किसी के द्वारा किसी अस्त्र के प्रयोग से मौत

• स्वयं ही अपनी जीवन लीला समाप्त करना

• वृद्धावस्था से होने वाली मौत

आदि प्रकार से मनुश्यों को मौत आती है परन्तु विभिन्न प्रकार से होने वाली मौत का रूप एक ही है वह है मृत्यु।

मृत्यु की सच्चाई

मृत्यु एक ऐसा सत्य है जिसे आज तक दुनियां में कोई भी भगवान से लेकर जानवर तक नही झूठला सका है। वह किसी न किसी माघ्यम से उसे अपने आगोस में ले लेती है परन्तु कारण किसी न किसी को बनना पड़ता है।

किसी इंसान की मृत्यु के बाद इंसान ही चर्चा करते है वह इस प्रकार से मौत का ग्रास बन गया ,लेकिन वह यह नहीं समझते की कारण तो केबल एक ही है वह है मौत। जन्म को तो सब देखते है परन्तु मौत को केबल वहीं इंसान देख पाता है जिसकी मृत्यु हो रही होती है।

मृत्यु का आसान तरीका

मृत्यु का एक मात्र तरीका है वह है चिन्तन मन से मृत्यु की अराधना करना जिस व्यक्ति ने मृत्यु की सच्चे मन से अराधना कर ली हो उसकी मृत्यु या फिर यह कहों कि उसको अपने प्राण त्यागने में कोई भी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। वैसे देखा गया है कि जब मनुश्य अपने जीवन के अन्तिम छडों में होता है और वह कश्ट छेल रहा होता है तो उसे उतना ही प्यार मौत से ठीक उतनी ही नफरत जीवन से होने लगती है।

परिभाशा

जीवन को हर प्राणी परिभाशित कर सकता है परन्तु मौत को कोई भी परिभाशित नहीं कर सकता है। क्योंकि जीवन जीने की कला है क्या यह कहें की मृत्यु मरने की कला है। मृत्यु तो केवल प्रभू के चरणों में अपना स्थान पाने का तरीका है अब लोग यह भी कह सकते है कि एक आदमी 150 साल जीवन जीता है वहीं दूसरा जन्म लेने के बाद या फिर जन्म लेते वक्त ही मर जाता है इसे क्या कहेगे। यह सब मनुश्य के भाग्य के ऊपर नहीं है जिस मनुश्य की प्रभू को जिस समय अवश्यकता पड़ने लगती है वह उसे उसी अवस्था में बुला लेता है और उसे जाना ही पड़ता है वह किसी भी प्रकार से आग्रह नहीं कर सकता या फिर वह समय नहीं मांग सकता कि मैं कल आऊगा या 10-15 मिनट के बाद आऊगा , उसे तो जाना ही पड़ता है

लोगों ने देखा होगा कि जो इंसान जितने अच्छे कर्म करता है उसे ही प्रभु अपने पास बुला लेता है और जो जितने बुरे कर्म करता है उसे उतनी ही देर में बुलाते है क्योंकि उस प्रभु के दरवार में अच्छे लोगों की कमी है देखा जाये तो इस संसार में बुरे लोगों का जमघट लगा रहता है कोई आता है कोई आने की कोिशश करता है जाने का कोई नाम ही नहीं लेता चाहिता।

मृत्यु की परिभाशा मेरे अनुसार तो मृत + यु से बना है मृत का मतलब मरा हुआ यु का मतलब तुम ं।

जब कोई िशशु जन्म लेता है तो उसे हमें रोक सकते है उसका इस संसार में पैदा होना रोक सकते है या फिर यूं कहे उसका गर्भ पात करके उस बच्चें को जन्म नहीं लेने दे सकते हैं ठीक इसके विपरीत जब कोई इंसान या फिर कोई भी जीवित प्राणी हो अगर वह मरने वाला है तो कोई भी लाख कोिशश कर ले उसे इस संसार से जाने से नहीं रोक सकता , उसे तो जाना ही पडे़गा, कोई कुछ भी नहीं कर सकता।

प्रत्येक मौत इंसान को एक ही सीख देती है कि मैं ही सत्य हंू और मैं ही अमर।

ऐसे तो जिन्दगी को हम देखे तो हमको दिखाई पड़ जाएगी कि मैं कुछ भी नहीं हूं इसे दिखाई पड़ने में कौन सी कठिनाई है मृत्यु रोज इसकी खबर लाती है कि हम कुछ भी नहीं है लेकिन हम मृत्यु को कभी गौर से नहीं देखते कि वह क्या खबर लाती है मृत्यु को तो हमने छिपाकर रख दिया है मरघट गांव के बाहर बना देते है ताकि दिखाई न पडे़, किसी दिन इंसान समझदार होगा तो मरघट गांव, शहर के चौराहे पर बना होगा कि रोज दिन में दस दफा निकलते आते-जाते दिखाई पड़े मौत का ख्याल आए कि मौत है अभी कोई लाश निकलेगी, मुर्दा निकलेगा , जब कोई लाश निकलती है तो हम बच्चों को घर के भीतर बुला लेते है कि मुर्दा निकल रहा है अन्दर आ जाओ। मुर्दा निकले और हममें समझ हो , तो सब बच्चों को बाहर इक्ठठा कर लेना चाहिए कि देखो यह आदमी मर गया ठीक इसी प्रकार हम सबको मर जाना है। केवल यह एक हकीकत है इसके अलावा दुनियां में सब निरंकार है मेरी मानें तो दुनियां में मृत्यु ही एक सत्य है इसके परे और दुनियां में कुछ भी नहीं बचता। आज का इंसान समझदार होते हुए भी नसमझ बना हुआ है वह यह जानता है कि मौत एक दिन किसी न किसी प्रकार से आयेगी और उसको सब कुछ यह इसी नशवान संसार में छोड़कर जाना पडे़गा। बावजूद इसके वह जीवन से इस कदर मौह करने लगता है और अपने आप को पूरी तरह से मोह-माया के चंगुल में जकड़ जाता है जैसे उसे कभी यह संसार छोड़कर जाना ही न हो।


कहते है कि जीवन और मरण सब प्रभु के हाथ में है कब किसकों भेज दे कब बुला लें ये तो सिर्फ उसी की लीला है वैसे एक जन्म लेने वाले बच्चों को कोई नहीं रोक सकता वो तो जन्म लेगा ही। ठीक उसी प्रकार जाने वाले को तो भगवान भी नहीं रोक पाते , उसे तो जाना ही है, पर जाने का रास्ता तो एक ही है वह है मौत।

प्रत्येक मौत इंसान को एक ही सीख देती है कि मैं ही सत्य हंू और मैं ही अमर।

ऐसा कोई पेड़ नहीं जिसको यह हवा न लगी हो

यह बात सौलह आने सच है कि एक उम्र के बाद कोई भी अछूता नहीं रहता, कोई कम, कोई ज्यादा करता जरूर है क्योंकि शारीरिक परिर्वतन एवं आस-पास के माहौल को देखकर, मन भी उसी दिशा में भटकने लगता है। जिस प्रकार हवा चलने पर सभी पेड़ हवा की दिशा में हिलने लगते है वह लाख कोिशश करें अपने आपकों हिलने से नहीं रोक सकते, उनके हिलना ही पड़ता है। चाहे वो चाहे या न चाहे। हर इंसान को उसी दिशा में चलना पड़ता है जहां सभी जा रहे है, जैसा कर रहे है, करना पड़ता है, मन चाहे या न चाहे, पर मन कुछ समय बाद करने लगता है आखिर मन है जिस प्रकार खाना खाते हुए दिखने पर, मन भी खाना खाने का करने लगता है चाहे आपने खाना खाया हो या नहीं। उसी तरह जो एक व्यक्ति करता है वह काम दूसरा भी शुरू कर देता है। आजकल के पहनावे को ले तो समझ आ जाएगा कि एक व्यक्ति जिस प्रकार के वस्त्रों को पहनकर समाज के सामने आता हे धीरे-धीरे उसी तरह वस्त्रों को कई लोग पहनने लगते है और वह फैशन में आ जाता है।


ऐसी ही इंसान की फिदरत में है जिस तरह की प्रेम कहानी सुनायी जाती है लैला-मजंनू, हीर-राझां, सीरी -फरहाद, रोमियो-जूलियट, जो एक दूसरे के लिए अपनी जान कुरवान कर सकते थे और की भी। मैंने शायद शब्द का प्रयोग इसलिए किया, क्योंकि मेरे पास इसके कोई प्रमाण मौजूद नहीं है जिससे मैं यह साबित कर सकूं कि ये लोग भी थे, जिनकी प्रेम कहानी हम सभी को सुनायी जाती है, सुनायी जाती रहेंगी। उन्ही का अनुसरण करने की कोिशश युवा पीढ़ी भी कर रही है वह अपने नामों को इन नामों के साथ जोड़ने की भरकस कोिशश करते है कुछ कामयाब भी हो जाते है इस कोिशश के चलते यह अपनी गली-मोहल्ले में मशहूर हो जाते है, इसके अलावा और कुछ नहीं होता, केवल मोहल्ले मे बदनामी ही फैलती है कि फलां-फलां का लड़का उस लड़की के पीछे पड़ा है या उस लड़की का सम्बंध किसी लड़के के साथ है वह उससे मिलती है जब यह बात माता-पिता को पता चलती है तब वह यह सिद्ध करने के लिए की हमारा बच्चा सही है, हम अपने बच्चों पर प्रतिबंध लगा सकते है, अपने बच्चों को थोड़ा डांट/मार-पीट देते है या कुछ समय के लिए घर की चार दीवारी में बन्द कर देते है। इसके अलावा वो कुछ नहीं हो सकता। बच्चा करता अपनी मर्जी का ही है, और इन प्रेम कहानी की तरह वह अपने प्यार को परवान चढ़ाता रहता है एक समय के बाद वो अपना सब कुछ प्रेम/प्यार के नाम पर लुटा चुका होता है लड़का अपना समय, धन तथा लड़कियां अपनी इज्जत। इन प्रेम कहानियों का अन्त सबको पता होता है सब जानते है कि इन प्यार करने वालों का कभी मिलाप नहीं हो पाया, न ही इन को हो पाएगा।

लड़कों का क्या है वह कुछ भी कर सकते है लड़की को सीता की भान्ति अग्नि परीक्षा देनी ही पड़ती है, चाहे वो कुछ भी कर लें।

ऐसा ही होता है लड़के का लड़की के साथ सम्बंध क्यों न हो, उसे शादी के लिए लड़की कुंवारी ही चाहिए। जिस कारण से वो हमेशा ही शक करता रहता है कि मेरी पित्न का कहीं किसी के साथ सम्बंध तो नहीं है या था, वह यह नहीं सोचता की जब वो राम नहीं बन सकता, तो सीता की आश कैसे कर सकता है। आज न तो कोई राम है न ही सीता। सबका दामन दागदार है चाहे इसका पता चले या न चलें, यह तो उसकी अन्तर आत्मा ही बता सकती है कि वो कितने पवित्र है।

शादी की रात लड़का अपने जीवन की सारी दास्तान किताब के पन्नों की तरह धीरे-धीरे खोल देता है परन्तु लड़कियां कभी यह नहीं बताती कि उसकी किसी लड़के के साथ दोस्ती थी या सम्बंध। वह शादी के बाद पतिवत्रा बनने की भरकस कोिशश में लगी रहती है। अपनी पुरानी जिन्दगी को किसी कब्र में दफन कर देती है। जब उस प्यार की पूण्यतिथि आती है तो उसे याद कर लिया जाता है, वह उसे पूर्णत: नहीं भूलती। वो अपने पति में भी उसको तलाशती है चाहे साथ खाना हो या सम्बंध बनाते समय, उसकी याद आ ही जाती है कि वो ऐसा करता था वो वैसा करता था, पर उसे भूला नहीं पाती।

लड़कियां लाख कोिशश कर लें वो पहले प्यार को नहीं भूला पाती। प्यार हो या अपने जीवन में घटित कोई भी घटना, इंसान उसे कभी नहीं भूला पाता l

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा



एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा


कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा


वो किसी और दुनिया का किनारा होगा


काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को


मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा


किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं


कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा


देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,


दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा


और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,


शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा


कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे


शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा


अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,


किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा


ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम


ग़र ये खेल ही दोबारा होगा


जानता हूँ अकेला हूँ फिलहाल


पर उम्मीद है कि दूसरी ओर ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा