बुधवार, 31 मार्च 2010

दोस्ती करना इतना आशान है

दोस्ती करना इतना आशान है जैसे माटी पर माटी से माटी लीखना,लेकीन प्यार नीभाना इतना मुस्कील है जैसे पानी पर पानी से पानी लीखना ................

लोग कहते है हमे आदत है मुस्कुराने की ..........लेकिन वो नहीं जानते यह अदा है गम छुपाने की ...........................
लोगो ने तो फूलो से मोहबत की काँटों को कीस ने याद कीया,हमने तो काँटों से मोहबत की क्योंकी फूलो ने हमको बर्बाद कीया ...........................
लोग कहते है हमे आदत है मुस्कुराने की ..........लेकिन वो नहीं जानते यह अदा है गम छुपाने की ...........................
हम न होते तो ग़जल कोन कहता,तुम्हारे खीले चहरे को कमल कोन कहता,यह तो करीश्मा है मोहबत का वर्ना पत्थर को ताजमहल कोन कहता .................
हर दीन के बाद रात आती है,हर मौत के बाद बहार आती है ,जींदगी चली जाती है दुल्हन बनकर,जब मौत लेकर बारात आती है .......................
साथी हो तो आंशु भी मुस्कान होते है,अगर न हो तो महल भी सम्शान होते है,साथी का ही तो खेल है सारा,वर्ना डोली और अर्थी सामान होते
गुलाब की खुशबू में कांटे पला करते है,चंदन की महक में साँप पला करते है,हर हँसी को ख़ुशी मत समझो,हर ख़ुशी में आंशु भी पला करते है ............
मेरी रात तेरे दीन से अछा होगा ,मेरा इकरार तेरे इनकार से अछा होगा,अगर यकीं न आये तो डोली से झाककर देखना मेरा जनाजा तेरी बारात से अछा होगा ,
कीसी की जीदगी में आती है बहार,तो कीसी को चमन तक नहीं मीलता,कीसी की कब्र में बनता है ताजमहल,तो कीसी को कफ़न तक नहीं मीलता.......................
ख्वाब देखे भी नहीं और टूट गए,वो हमसे मीले भी नहीं और रूठ गए,में जागती रही और दुनीया सोती रही,बस बारीश थी जो रात भर रोती रही ................
सुना है वो जाते हुए कहे गए की अब तो हम सीरफ तुम्हारे सपनो में आयेगे,कोई कह दे उनसे की वोह वादा तो करे हम जीदगी भर के लीये सो जायेगे ........

जो कोई उनसे करता है?

फिर शाम आये मेरे दर पर ले कर चाँद का पैगाम,


कर लो दोस्ती तुम हम से मेरी दोस्ती लिखी तेरे नाम.

हम ने कहा के जानते नही हम तुम को कैसे बना ले दोस्त हम,

कर ले कैसे दोस्ती तुम से क्यो दोस्ती लिखी मेरे नाम.

चाँद ने कहाँ के मै जानता तुम्हे,

तुम जानती नही मै देखता रहता तुम्हे,

तुम्हारे सुन्दर चेहरे पर मेरी रोशनी पडे सुबह शाम,

कर लो दोस्ती तुम हम से मेरी दोस्ती लिखी तेरे नाम.

दोस्त बनाने के लिये बहुत मिल जायेंगे,

पर समझ जाये अपने दोस्त को मन से ऐसा कोई मिलता नही,

तुम हम को समझोगे कैसे, जानोगे कैसे मेरे मन की बात,

कर लू कैसे दोस्ती तुमसे क्यों दोस्ती लिखी मेरे नाम.

चाँद ने कहा मै दूर हूं माना,

पास आ सकता नही ये है जाना,

दूर हो कर भी पास मै रहुंगा,

कभी भी तुम को यूं उदास ना देख सकुंगा,

कर लो दोस्ती तुम हम से मेरी दोस्ती लिखी तेरे नाम.

क्या इतनी ही दूर रहने वाले अपने दोस्त को समझ सकते है,

दोस्त के जज़्बात को ओर मन की बात को, किस हद तक जान सकते है,

क्या अपने दोस्त से इस तरहा ही दोस्ती निभा सकते है,

जो कोई उनसे करता है?

मंगलवार, 30 मार्च 2010

किसी और को दोस्त बनाने की ज़रूरत नही

बातें करके रुला ना दीजिएगा...


यू चुप रहके सज़ा ना दीजिएगा...

ना दे सके ख़ुशी, तो ग़म ही सही...

पर दोस्त बना के यूही भुला ना दीजिएगा...

खुदा ने दोस्त को दोस्त से मिलाया...

दोस्तो के लिए दोस्ती का रिस्ता बनाया...

पर कहते है दोस्ती रहेगी उसकी क़ायम...

जिसने दोस्ती को दिल से निभाया...

अब और मंज़िल पाने की हसरत नही...

किसी की याद मे मर जाने की फ़ितरत नही...

आप जैसे दोस्त जबसे मिले...

किसी और को दोस्त बनाने की ज़रूरत नही

कल हो ना हो ....

आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो


बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो

क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना

और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो



आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ

आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ

क्या पता कल ये बाते

और ये यादें हो ना हो



आज एक बार मन्दिर हो आओ

पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ

क्या पता कल के कलयुग मे

भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो



बारीश मे आज खुब भीगो

झुम झुम के बचपन की तरह नाचो

क्या पता बीते हुये बचपन की तरह

कल ये बारीश भी हो ना हो



आज हर काम खूब दिल लगा कर करो

उसे तय समय से पहले पुरा करो

क्या पता आज की तरह

कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो



आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ

आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो

क्या पता कल जिन्दगी मे चैन

और आखों मे कोई सपना हो ना हो



क्या पता

कल हो ना हो ....

सोमवार, 22 मार्च 2010

उनके लिए धड़कने भी जरुरी नहीं होती

दिन हुआ है तो रात भी होगी,



हो मत उदास कभी तो बात भी होगी,


इतने प्यार से दोस्ती की है खुदा की कसम


जिंदगी रही तो मुलाकात भी होगी.


कोशिश कीजिए हमें याद करने की


लम्हे तो अपने आप ही मिल जायेंगे


तमन्ना कीजिए हमें मिलने की


बहाने तो अपने आप ही मिल जायेंगे .


महक दोस्ती की इश्क से कम नहीं होती


इश्क से ज़िन्दगी ख़तम नहीं होती


अगर साथ हो ज़िन्दगी में अच्छे दोस्त का


तो ज़िन्दगी जन्नत से कम नहीं होती


सितारों के बीच से चुराया है आपको


दिल से अपना दोस्त बनाया है आपको


इस दिल का ख्याल रखना


क्योंकि इस दिल के कोने में बसाया है आपको .


अपनी ज़िन्दगी में मुझे शरिख समझना


कोई गम आये तो करीब समझना


दे देंगे मुस्कराहट आंसुओं के बदले


मगर हजारों दोस्तो में अज़ीज़ समझना ..


हर दुआ काबुल नहीं होती ,


हर आरजू पूरी नहीं होती ,


जिन्हें आप जैसे दोस्त का साथ मिले ,


उनके लिए धड़कने भी जरुरी नहीं होती

आपसे दोस्ती हम यूं ही नही कर बैठे,

आपसे दोस्ती हम यूं ही नही कर बैठे,

क्या करे हमारी पसंद ही कुछ "ख़ास" है. .

चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,

तोह चाँद की चाहत किसे होती.

कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,

तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.

कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,

इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,

जब दिल उब जाए हमसे तोह बता देना,

न बताकर बेवफाई मत करना.

दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता है

अस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता है

दोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,

अगर दोस्त सचा हो तो खुदा भी झुक जता है.

दोस्ती वो एहसास है जो मिटती नही.

दोस्ती पर्वत है वोह, जोह झुकता नही,

इसकी कीमत क्या है पूछो हमसे,

यह वो "अनमोल" मोटी है जो बिकता नही . . .

सची है दोस्ती आजमा के देखो..

करके यकीं मुझपर मेरे पास आके देखो,

बदलता नही कभी सोना अपना रंग ,

चाहे जितनी बार आग मे जला के देखो

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

जुदा हूँ मैं,

न जानू की कौन हूँ मैं,


लोग कहते है सबसे जुदा हूँ मैं,

मैने तो प्यार सबसे किया,

पर न जाने कितनो ने धोखा दिया।



चलते चलते कितने ही अच्छे मिले,

जिनने बहुत प्यार दिया,

पर कुछ लोग समझ ना सके,

फिर भी मैने सबसे प्यार किया।



दोस्तो के खुशी से ही खुशी है,

तेरे गम से हम दुखी है,

तुम हंसो तो खुश हो जाऊंगा,

तेरे आँखो मे आँसु हो तो मनाऊंगा।



मेरे सपने बहुत बढे़ है,

पर अकेले है हम, अकेले है,

फिर भी चलता रहऊंगा,

मजिंल को पाकर रहऊंगा।



ये दुनिया बदल जाये पर कितनी भी,

पर मै न बदलऊंगा,

जो बदल गये वो दोस्त थे मेरे,

पर कोई ना पास है मेरे।



प्यार होता तो क्या बात होती,

कोई तो होगी कहीं न कहीं,

शायद तुम से अच्छी या,

कोई नहीं नही इस दुनिया मे तुम्हारे जैसी।



आसमान को देखा है मैने, मुझे जाना वहाँ है,

जमीन पर चलना नही, मुझे जाना वहाँ है,

पता है गिरकर टुट जाऊंगा, फिर उठने का विश्वास है

मै अलग बनकर दिखालाऊंगा।



पता नही ये रास्ते ले जाये कहाँ,

न जाने खत्म हो जाये, किस पल कहाँ,

फिर भी तुम सब के दिलो मे जिंदा रहऊंगा,

यादो मे सब की, याद आता रहऊंगा।

गुरुवार, 18 मार्च 2010

दोस्त कहना ही दोस्ती नहीं होती

दूरियों से फर्क पड़ता नहीं


बात तो दिलों कि नज़दीकियों से होती है

दोस्ती तो कुछ आप जैसो से है

वरना मुलाकात तो जाने कितनों से होती है

दिल से खेलना हमे आता नहीं

इसलिये इश्क की बाजी हम हार गए

शायद मेरी जिन्दगी से बहुत प्यार था उन्हें

इसलिये मुझे जिंदा ही मार गए

लोग मोहब्बत को खुदा का नाम देते है,

कोई करता है तो इल्जाम देते है।

कहते है पत्थर दिल रोया नही करते,

और पत्थर के रोने को झरने का नाम देते है।

भीगी आँखों से मुस्कराने में मज़ा और है,

हसते हँसते पलके भीगने में मज़ा और है,

बात कहके तो कोई भी समझलेता है,

पर खामोशी कोई समझे तो मज़ा और है...!

मुस्कराना ही ख़ुशी नहीं होती,

उम्र बिताना ही ज़िन्दगी नहीं होती,

दोस्त को रोज याद करना पड़ता है,

क्योकि दोस्त कहना ही दोस्ती नहीं होती

बुधवार, 17 मार्च 2010

सच का एक करबां: इन सवणोZ के अत्याचार को रोकने में बहुत हद तक डां0 अम्बेडकर साहब ने प्रयत्न किये।

सोमवार, 15 मार्च 2010

सामाजिक सद्भाव की नगरी ललितपुर

 सामाजिक सद्भाव की नगरी ललितपुर में यूं तो सभी धर्मो के लोग आपसी भाई-चारा और प्रेम सौहार्द के अटूट बंधन में कुछ इस तरह बंधे है कि एक-दूसरे की छोटी-बड़ी िशकायतें आपस में कह सुनकर ही नज़रअन्दाज कर देते है। किसी भी धर्म के अनुयायी को दूसरे धर्म की आलोचना करने में झिझक ही नहीं गिलानी भी महसूस होती है क्योंकि उसे श्रृद्धा से मानने वाले हमारे ही बीच रहते है और हम सब भाई बंधु के रिस्ते में बंधे है। परन्तु हमारे बीच जब कभी कोई बड़ी वजह धर्म को लेकर प्रहार करने लगे तो निश्चय ही हम धर्म गुरूओं की शरण लेते आये है। यही तरीका भी है लेकिन जब कोई धर्म गुरू महात्मा ही आघात का कारण बन जाए तो कहां जाएं, किससे कहें, या घुटते रहे और बस घुटते रहें। जी हां मैं तुच्छ प्राणी उन महान् मुनियों को आरोपित करने पर मजबूर हुआ हूं जो मेरी भी अटूट श्रृद्धा के पात्र है मगर एक मात्र वजह उनका नगर में वेपर्दा भम्रण मुझे सामाजिक दृिश्ट से उचित नहीं लगता , किससे कहूं र्षोर्षो कौन हैर्षोर्षो जो समझायेगा इसे उचित समझने की तरकीब! मेरा ध्यान जाता है केवल मुनि श्री के चरणों में केवल वहीं मेरा मार्ग दशZन कर सकते है मगर मेरा सम्पूर्ण मनोविज्ञान मेरे प्रश्न को इतना गलत ठहराता है कि सीधा कहने की हिम्मत जुटा पाना शायद मेरे वश में नहीं। यही कारण है जो इसे इस तरह समाज के समक्ष व्यक्त कर रहा हूं। ऐसा नहीं है कि यह जिज्ञासा केवल मेरी ही है जनपद का शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसने इस विशय पर आज तक तर्क-वितर्क न किए हो। प्रतिदिन भ्रमण काल में स्वयं मुनि श्री ने भी इस जिज्ञासा को घुरती, शर्माती, या झुकती निगाहों में पढ़ा होगा। ऐसा मेरा अनुमान है अपनी जिज्ञासा को व्यक्त करने में कुतर्क करने की भूल कर सकता हूं। जिसे क्षमा करने की कृपा करें। मेरी जिज्ञासा सभी धर्म के अनुयायियों के समक्ष प्रस्तुत है। मुनि स्वरूप यदि जैसा है आवश्यक है तो क्या उनका नगर भ्रमण न होकर मन्दिर परिधि में सीमित नहीं रह सकता। क्योंकि नगर में सभी धर्मो के मानने वाले रहते है जबकि मन्दिर में तो केवल एक धर्म के ही अनुयायी उस समय होगें अथवा वह लोग होगें जो दशZन लाभ लेना चाहेगें। ऐसा सुना है कि उक्त स्वरूप के पूर्व मुनि श्री एक वस्त्र धारण की अवस्था में रहते थे। क्या सर्व समाज के हित में कुछ समय के लिए (केवल भ्रमण काल के वक़्त) पूर्व अवस्था में आना त्याग की परिभाशा में स्वीकार हो सकता है। उक्त निवेदनों के सापेक्ष मेरे तर्क जो शायद कुतर्क हो। यह है कि आज त्याग की पराकश्ठा पर कर चुके मुनि श्री या वर्ग विशेश के मेरे बंधु-बंाधवों का ध्यान क्या इस ओर गया है कि जब सब कुछ त्याग दिया फिर उदर पूर्ति में नगर की भीतरी सीमा ही आवश्यक क्यों र्षोर्षो या कीमती भवनों में प्रवेश वर्जित क्यों नहीं र्षोर्षो यदि इस का जबाव यह है कि उपरोक्त सब कुछ श्रृद्धालुओं की अनुनय विनय के कारण होता है न कि मुनि श्री की इच्छानुसार ,तो क्या यह विनय श्रृद्धालुओं की सीमित स्वार्थी सोच का दशZन नहीं कराती। और क्या अनुनय विनय में एक विनय और शामिल नहीं हो सकती, यदि ऐसा है तो न्याय धर्म गुरू ही कर सकते है। दूसरी बात में तर्क यह है कि यदि त्याग की पराकश्ठा की ओर अग्रसित मुनि श्री नगर सीमा में समाज कल्याण या प्राणी मात्र के कल्याण की भावना से ही आते है तो क्या एक वस्त्र धारण उनकी भावना को आहत कर सकता है।

मोह माया के संसार में “वास तो सभी ले रहे है फिर चाहें वह साधारण मनुश्य हो , अथवा विलक्षण प्रतिभा के धनी और लोक -परलोक की जानकारी प्राप्त मुनि श्री जब मायावी संसार में विरक्त भी रह सकते है और संासारिकता उनकी विरक्ति को क्षति ग्रस्त नहीं कर पाती तब तन पर वस्त्र हैं अथवा नहीं क्या फर्क पड़ता है। कहीं यह मात्र आकशZण में सहायक तो नहीं , ऐसा सुना है कि संसार में विपरीत का आकशZण है जैसे चुम्बक के विपरीत दो सिरे ही परस्पर आकर्शित होते है सामान सिरों को यदि पास में लाया जाता है तो प्रति कर्शित ही होते है इसी प्रकार संसार में विपरीत लिंग का आकशZण है इसी क्रम में कहीं कपड़े के व्यापारी और वस्त्र विहीन मुनि श्री का आकशZण तो नहीं । वाणी की अति किसी तपस्वी को रूश्ट न कर दें इसलिए क्षमा चहता हूं। मेरे तकोZ पर मनन और चिन्तन से अन्तत: लाभ की ही संभावना है यदि मेरी बातें सत्यता के ओत-प्रोत है तो सर्व समाज की कुंठा शान्त होगी। और यदि ऐसा नहीं तो सर्व समाज कि कुंठा का मुनि श्री अपनी ज्ञान ऊर्जा से समाधान करें ऐसी मेरी प्रार्थना है।

यह तो सभी ने जाना और समझा है कि मुनि श्री किसी वर्ग विशेश के लिए नहीं है अभी हाल में उन्होंने सभी समाज से कुछ अपीले कि थी जिसका सर्व समाज ने पूरे मन से आदर किया था और बहुतों ने उन कल्याणकारी प्रस्तावों को आत्मसात भी किया , तो क्या सर्व समाज की एक प्रार्थना मुनि श्री स्वीकार नहीं करेगें।

जब एक समाज विशेश के लोग मांसाहार जो उनके लिए खाद्य श्रृंखला है को गलत मान सकते है और इसे सिद्व किया जा सकता है



शुक्रवार, 12 मार्च 2010

भारत में वेश्यावृत्तिः कालक्रम और कारण

भारतीय समाज का कोई भी अंग या इतिहास का कोई काल वेश्याओं या वेश्यावृति से मुक्त नहीं रहा है । इनके विकास का इतिहास समाज के विकास से जुड़ा हुआ है । वैदिक काल की अप्सराएं और गणिकाएं, मध्ययुग में देवदासियां और नगरवधुएं तथा मुगलकाल में वारंगनाएं इसी कड़ी से जुड़ी हुई हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता के खनन के दौरान कांसा की बनी नर्तकी की मुर्ती उस काल में इनकी उपस्थिती को इंगित करती है । प्रारंभ में ये धर्म एवं कलाओं से सम्बध थी । हालांकी ‘पद्मपुराण’ के अनुसार मन्दिरों में नृत्य के लिए जो बालिकाएं क्रय की जाती थी, वे नर्तकियां वेश्याओं से भिन्न नहीं थीं । मन्दिरों में नृत्य हेतु बालिकाएं भेट की जाती थी क्योंकी एसी मान्यताएं थीं कि बालिकाएं भेंट करने वाला स्वर्ग प्राप्त करता है। ‘नगरवधुओं’ को समाज में सम्मान जनक स्थान प्राप्त था, जो राज्य की सबसे उच्च कोटी की नर्तकी हुआ करती थी । उसी तरह ‘देवदासी’ ऐसी स्त्रियों को कहते हैं जिनका विवाह मन्दिर या अन्य किसी धार्मिक प्रतिष्ठान से कर दिया जाता था । समाज में उन्हें उच्च स्थान प्राप्त होता था और उनका काम मन्दिरों की देखभाल करना तथा नृत्य एवं संगीत सीखना होता था। परंपरागत रूपसे वे ब्रह्मचारी होती थी । इसका प्रचलन दक्षिण भारत में प्रधान रूप से था ।

मध्ययुग में सामतंवाद की प्रगति के साथ इनका अलग-अलग वर्ग बनता चला गया । इसमें से कुछ समूह ऐसे थे जिनकी रूचि कलाप्रियता के साथ कामवासना में बढ़ने लगी । परन्तु कला से सम्बन्धित लोगों के साथ यौनसम्बन्ध सीमित और संयत थे । कालान्तर में नृत्यकला, संगीतकला एवं सीमित यौनसंबन्ध द्वारा जीविकोपार्जन में असमर्थ इन महिलाओं को बाध्य होकर जीविका हेतु लज्जा तथा संकोच को त्याग कर वेश्यावृति के दलदल में उतरना पड़ा ।

वेश्यावृति को बढ़ावा देने में आज आर्थिक कारण प्रमुख भूमिका निभा रहा है । चुंकि रोजगार पाना आज के समय में अत्यन्त श्रमसाध्य कार्य हैं, साथ ही योग्यता के अभाव में या कम योग्य होने पर पैसे भी कम प्राप्त होते हैं, जबकि इस पेशे में पैसे की अधिकता होने के कारण, अधिक विलासितापुर्ण जीवन जीने की इच्छा रखने वाली युवतियां आसानी से स्वत: या दलालों के झांसे में आकर, इस दलदल में फंस जाती है । उत्तरप्रदेश के कानपुर शहर के एक अध्ययन के अनुसार लगभग 65 प्रतिशत वेश्याएं आर्थिक कारण से ही इस पेशे को अपनाती है ।

हालांकि समाज के लिए अभिशाप माने जाने वाले इस पेशे के पिछे सिर्फ आर्थिक कारण न होकर अन्य विभिन्न कारण भी हैं । इस पेशे को अभिशाप इसलिये माना जाता है कि अनेक ऐसे उदाहरण समाज में मिल जाते हैं जो वेश्याओं या सेक्सवर्करों के पीछे अपना ऐश्वर्य, समय, पारिवारिक सुख, मानसिक शान्ति या हम यूं कहें कि अपना सर्वस्व लुटा बैठते हैं । परिवार की संपति धीरे-धीरे सेक्सवर्करों के पीछे बर्बाद कर दिये जाते हैं । परिवार के सदस्यों को खाने के लाले पड जाते हैं । अभावों के बीच उनका जीना दुस्वार हो जाता है । ऐसे पुरुषों के पत्नी, माता-पिता तथा अन्य सदस्यों को भी सामाजिक प्रतारणा झेलनी पड़ती है । धन के अभाव में बच्चों की परवरिश सही ढंग से नहीं हो पाती, परिवार का विकास रूक जाता है । सीधे शब्दों में कहा जाए तो पूरा का पूरा परिवार बिखर जाता है और समाज की प्राथमिक इकाई परिवार के विघटन का दुष्प्रभाव सामाजिक संगठन पर भी पड़ता है ।

सामाजिक कारण भी एक प्रमुख कारण है । समाज ने अपनी मान्यताओं, रूढ़ियों और त्रुटिपूर्ण नीतियों द्वारा इस समस्या को और जटिल बना दिया है। विवाह संस्कार के कठोर नियम, दहेजप्रथा, विधवा विवाह पर प्रतिबन्ध, सामान्य चारित्रिक भूल के लिए सामाजिक बहिश्कार, छुआ छुत, आवश्यकतानुसार तलाक प्रथा का प्रचलन न होना आदि अनेक कारण सेक्सवर्करों की संख्या तथा उनके पेशे को बढ़ावा देने में सहायक होते हैं । इस पेशे को त्यागने के पश्चात समाज उन्हें सहज रूप में स्वीकार नहीं करता । ऐसी स्त्रियों के लिए हुआ करती हैं ।

युवतियों द्वारा यौनसम्बन्ध को लेकर उन्मुक्तता की इच्छा रखना, विवाहित पुरुषों द्वारा सेक्सवर्करों का इस्तेमाल तथा विवाहेत्तर सम्बन्ध एवं विवाहित स्त्रियों के विवाहेत्तर सम्बन्ध भी इसका कारण है । अन्य कारणों में चरित्रहीन माता-पिता अथवा साथियों का सम्पर्क, घरेलु हिंसा तथा अन्य जगहों पर शारीरिक उत्पिड़न, अश्लील साहित्य, वासनात्मक मनोविनोद और चलचित्रों में कामोत्तेजक प्रसंगों की अधिकता ने भी सेक्सवर्करों के पेशे को बढ़ावा दिया है।

अगर हम राजस्थान का उदाहरण लें तो अभिलेखिय एवं साहित्यिक स्त्रोतों से ज्ञात होता कि प्राचीन काल से प्रचलित दास-दासी प्रथा, 19 वीं सदी के अन्त तक जारी रही । दास - दासी प्रथा के कारण स्त्रियों और लड़कियों की खरीद - फरोख्त प्रचलित थी । दास - दासियों को विवाह में दहेज के साथ देने के अतिरिक्त कुछ सामन्त या सम्पन्न लोग स्त्रियों को रखैल के रूप में रखने के लिए, अपनी काम - पिपासा तृप्त करने के लिए युवा लड़कियों से अनैतिक पेशा करवाने के लिए ‘मेवाड़’ में स्त्रियों का क्रय - विक्रय भी होता था। राज्य के बाहर से भी स्त्रियां खरीदकर लायी जाती थीं। ‘मेवाड़’ में महाराणा शंभूसिंह के शासन काल में पोलीटिकल एजेंट कर्नल ईडन द्वारा इस प्रथा को गैर कानुनी घोषित कर दिया गया । इस प्रकार 19 वीं शताब्दी के अन्त तक स्त्रियों की क्रय-विक्रय प्रथा लगभग समाप्त हो चुकी थी । परन्तु समाज में बहु-विवाह, रखैल एवं क्रय-विक्रय की प्राचीन प्रथा ने वेश्यावृति को प्रोत्साहित किया। अनेक वेश्याएं भी छोटी उम्र की लड़कियों को खरीद लेती थीं और उनके युवा होने पर उससे वेश्यावृति करवाती थीं । संगीत और नृत्य में निपुण प्रमुख वेश्याओं को राजकीय संरक्षण प्रदान किया जाता था और उन्हें राजकोश से नियमित धन दिया जाता था । अनेक वेश्याएं मन्दिरों में नृत्य-संगित किया करती थी और बदले में उन्हें पुरस्कार आदि मिलता था । सामान्य वेश्याएं नृत्य संगित तथा यौन - व्यापार द्वारा अपना जीवन निर्वाह करती थीं । 20 वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक वेश्यावृति व यौन - व्यापार को समाप्त करने अथवा नियन्त्रित करने की दिशा में भेवाड़ या ब्रिटिश सरकार की तरफ से कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया था ।
सिर्फ मेवाड़ या राजस्थान ही उदाहरण नहीं हैं , इतिहास में ऐसे अनेक ठिकाने रहे है जो वेश्यावृति या सेक्सवर्करों के अड्डे के रूप में जाने जाते रहे हैं चाहे वह वाराणसी का ‘दालमण्डी´ हो या सहारणपुर का ‘नक्कासा बाजार’।
बिहार में मुजफ्फरपुर का ‘चतुर्भज स्थान’ और सीतामढ़ी का ‘बोटा टोला’ इसके लिए जाना जाता रहा है । ठीक उसी तरह कोलकत्ता का सोनागाछी, मुम्बई का कमाठीपूरा, दिल्ली का ‘जी.बी.रोड’, ग्वालियर का ‘रेशमपूरा’ तथा पूणे का ‘बुधवार पेठ’ भी इसके प्रमुख केन्द्र रहे हैं ।

मंगलवार, 9 मार्च 2010

शर्म के बारे में पूछता है कोई जब हमसे

शर्म के बारे में पूछता है कोई जब हमसे

हां कह देते है हम कि हमें भी आती है कभी-कभी

रिश्ता हमारा टूट चूका है वैसे तो शर्म से

पुराने सम्बंधों के आधार पर आ जाती है बस कभी-कभी

भीड़ में रहें तो कह देते है कि आती है शर्म

बाकी नज़रें चुरा-चुरा कर देख लेते है कभी-कभी

चाहते तो नहीं पर समय जब पूछता है हिसाब और

जमाना कहता है तो झांक लेते है गिरेवां में कभी-कभी

गूंगा नहीं था मैं



गूंगा नहीं था मैं कि बोल नहीं सकता था

जब मेरे स्कूल के मुझसे कई क्लास छोटे

बढे़गें से एक फार के लड़के ने मुझसे कहां

`` ओ-ओ मोरिय! ज्यादें विगडें मत ।

क्मीज कू पेंट में दवा के मत चल ´´

और मैनें चुपचाप अपनी कमीज

पैंट से बाहर निकाल ली थीं गूंगा नहीं था मैं

न अक्षम, अपाहिज था जड़ था

कि प्रतिवाद नहीं कर सकता थां उस लड़के को इस

अपमानजनक व्यवहार का लेकिन

अगर मैं बोल सकता जातीय अहं का सिहांसन डोल जाता

स्वर्ण छात्रों में जंगल की आग की तरह

यह बात फैल जाती कि ढे़ढ़ो का दिमाग चढ़ गया है

फिसल गया है कि एक चमार का लड़का

काफीपुरा के एक लड़के छोरे से अड़ गया है

आपसी मतभेदों को भुलाकर तुरन्त-फुरन्त स्कूल के

सारे स्वर्ण छात्र गोलबदं हो जाते और

ये ना अध्यापक ये होकिया ले -लेकर

दलित छात्रों पर हल्ला बोल देते

इस हल्ले में कई दलित छात्रों के

हाथ -पैर टुटते कई के सिर फूटते

और स्कूल परिसर के अन्दर

हगामा करने के जुर्म में

हम ही स्कूल से

रस्टीगेट कर दिये जाते।

अपना पता न अपनी खबर छोड़ जाऊंगा


अपना पता न अपनी खबर छोड़ जाऊंगा

बे सािम्तयों की गर्द-ए-सफर छोड़ जाऊंगा

तुझसें अगर बिछड़ भी गया तो याद रख

चेहरे पे तेरे अपनी नज़र छोड़ जाऊंगा

ग़म दूरियों का दूर न हो पायेगा कभी

वह अपनी कुर्वतों का असर छोड़ जाऊंगा

गुजरेगी रात - रात मेरे ही ख्याल में

तेरे लिए मैं सिर्फ सहर छोड़ जाऊंगा

जैसे कि शम्आदान में बुझ जाये कोई शम्आ

बस यूं ही अपने जिस्म का घर छोड़ जाऊंगा

मैं तुझकों जीत कर भी कहां जीत पाऊंगा

लेकिन मुहब्बतों का हुनर छोड़ जाऊंगा

आंसू मिलेगें मेरे न फिर तेरे कह कहें

सूनी हर एक राह गुजर छोड़ जाऊंगा

सफर में अकेला तुझे अगले जन्म तक

है छोड़ना मुहाल , मगर छोड़ जाऊंगा

उस पार जा सकेगी तो यादें ही जायेगी

जी कुछ इधर मिला है इधर छोड़ जाऊंगा

ग़म होगा सबकों और जुदा होगा सबका ग़म

क्या जाने कितने दीद-ए - दर (भीखी आंख) छोड़ जाऊंगा

बस तुम ही याद रहोगें,ं कुरेदोगें तुम अगर

मैं अपनी राख में जो शरर(चिनगारी) छोड़ जाऊंगा

कुछ देरे को निगाह ठहर जायेगी जरूर

अफसाने में एक ऐसा खण्डर छोड़ जाऊंगा

कोई ख्याल तक भी न छू पायेगा मुझें

मैं चारों तरफ आठों पहर छोड़ जाऊंगा

इन सवणोZ के अत्याचार को रोकने में बहुत हद तक डां0 अम्बेडकर साहब ने प्रयत्न किये।


अम्बेडकर का जन्म सामाजिक रूप से दलित कहे जाने वाली जाति में हुआ था। उन्होंने पिश्चमी तज़Z पर तालीम हासिल की। उनका नज़रिया बेहद तािर्कक मगर मिज़ाज एकदम विद्रोही था। उन्होंने समाज के उस तबके को कुशल नेतृत्व प्रदान किया जो सदियों से अभिशप्त था। शूद्र कहलाया जाता था। परहेज किया जाता था, उनके स्पशZ से उनकी परछाई से। यहां तक कि उनके मुंह से निकले बोल भी अशुभ समझे जाते थे। इस अछूत समुदाय को तत्कालीन वर्ण व्यवस्था और राजशाही ने कितना उत्पीड़ित किया होगा, इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शूद्रों को पशु पालने और कुछ विशेश धातुओं के आभूशण तक पहनने से रोका जाता था। वे नाइयों और धोबियों की सेवाएं भी नहीं ले सकते थ। जब सार्वजनिक कुओं , तालाबोें और स्कूलों तक शूद्रों की पहुंच नहीं थी, तो मिन्दरों की बात ही क्या की जाए। स्थिति यह थी कि शूद्र थे तो भारतीय, पर वे भारत की सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते थे। पृथकीकरण ने उनको सामाजिक रूप से मजलूम, आर्थिक रूप से मजबूर और राजनीतिक रूप से महकूम बना कर रखा था। वे लोक सेवाओं में विशेशकर प्रशासन, पुलिस और सेना में भर्ती नहीं किए जाते थे। लिहाजा घूम फिरकर उनकों अपने पैतृक पेशे पर ही सन्तोश करना पड़ता था। यानी एक दलित जिस हाल में पैदा होता , उसी हाल में मर जाता। इसी हाल में अनेक पीढ़ियां आत्म सम्मान पाने और अपनी हालत में सुधार की तमन्ना लिए दुनियां से विदा होती थी। ऐसी मुिश्कल परिस्थितियों में दलित समाज को अपने अभ्युत्थान के लिए किसी ऐसे मसीहा की जरूरत थी। जो उनकी आंख , जुबान और लाठी बन सके।

अम्बेडकर ने दलित समाज को ऐसे ही मोड़ पर करिश्माई नेतृत्व प्रदान कर इस कमी को पूरा किया, क्योंकि उनसे पहले जाति विरोधी आन्दोलन मुख्य रूप से दलित कल्याण पर ही केिन्द्रत था। मगर अम्बेडकर ने इसका नाकाफी समझते हुए इस बात पर बल दिया कि सामिाजक व्यवस्था में परिवर्तन तभी ला सकते हैं। जब दलित समुदायों को भी बराबर के राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों। इस प्रकार पहली बार अम्बेडकर ने छुआछूत की समस्या और अछूतों के लिए राजनीतिक अधिकारों को मुख्य कार्यसूची में शमिल किया था। अम्बेडकर ने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान यह महसूस कर लिया था कि ब्रिटिश राज के खात्मे के बाद कम से कम राजशाही या सामन्तशाही सत्ता के रूप में पुनस्Zथापित नहीं हो सकेगी और ऐसा हुआ भी। जब राश्ट्र स्वतन्त्र हुआ तो हमने लोकतन्त्र केा चुना। लोकतन्त्र को स्थापित करना बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य था, क्योंकि समाज कुनबों -कबीलों , जाति-बिरादरियों और अनेक पन्थ -सम्प्रदायों में बंटा हुआ था। ऐसा समाज लोकतन्त्र को सिर्फ ढो ही सकता था। बिना सामाजिक न्याय के लोकतन्त्र अपने मकसद को नहीं पा सकता था, क्योंकि जिस चीज पर लोकतन्त्र की बुनियाद टिकी है वह हमारे पा बिल्कुल नहीं थी, यानी कि सामाजिक समरसता। इन परिस्थितियों में एक नव स्वतन्त्र राश्ट्र राज्य के रूप में स्थापित करना टेढ़ी खीर साबित होता। इन्हीं संभावनाओं के मद्देनज़र अम्बेडकर ने अपना सारा जीवन सामाजिक न्याय की स्थापना करने के प्रयास में खपा दिया। ऐसा करके एक और जहां उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से दलित समाज को आत्म सम्मान दिलाने का मौका दिलाया तो परोक्ष रूप से वर्ण व्यवस्था के निर्देशन तले चलने वाली प्रजातान्त्रिक व्यवस्था को टूटने से भी बचाया। अम्बेडकर ने सामाजिक न्याय से जुड़े हर पहलू पर गम्भीर चिन्तन किया।

डां. अम्बेडकर अपने पूरे जीवन काल में दलित मुक्ति को लेकर संघशZरत रहे। वे सामाजिक विचारों में वह स्वतन्त्रता , समानता और बंधुत्व के जबरदस्त हिमायती थे। यह स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्व पूरी इन्सानियत के लिए संप्रेशणीय बने, और उनकी जिन्दगी का आधार बने, ऐसा वह चाहते थे। इससे दलित जातियां भी इन मूल्यों का स्वाद चख सकेंगी और सदियों से पड़ी उन पर गुलामी की चादरें धीर-धीरे कटती जाएंगी। आर्थिक विचारों में वह पूर्ण राश्ट्रीयकरण के हिमायती थे। वह चाहते थे कि सारे उद्योग तथा सारी खेती किसानी सरकारी क्षेत्र में नियन्त्रित रहे। सरकार श्रमिकों और अधिकारियों की नियुक्ति करे। इसका तत्काल फायदा दलित जातियों को ही ज्यादा मिलता क्योंकि वे ही सदियों से श्रम-व्यवस्था से जुड़े थे। कृशि कार्यो और उद्योग जगत को मिलाकर वह एक बड़े श्रमिक वर्ग का निर्माण करना चाहते थे, जिससे सामन्ती तथा पूंजीवादी तत्व नश्ट हो जाएं। इससे स्वाभाविक रूप से, सामाजिक स्तर पर ब्राह्मणवादी परांपरा भी ध्वस्त होती। जब खेती व उद्योगों में एक साथ ब्राह्मण व दलित श्रमिक बनकर काम करेंगे तो दोनों के बीच मंआ एक वणीZय मैत्री का विकास हो जाएगा। वेतन की समानता वर्गीय चेतना पैदा कर देती है। दुर्भाग्यवश उनके आर्थिक विचारों को उतना महत्व नहीं मिल सका। सामाजिक विचारों को तो उन्होंने भारतीय संविधान में समाहित करा लिया था किन्तु आर्थिक विचारों को संविधान में नहीं जोड़ पाए।

5 दिसम्बर 1931 को डां0 अम्बेडकर लन्दन से अमेरिका गए। वहां से वह 29 जनवरी 1932 को स्वदेश लौटे

डां0 अम्बेडकर की शायद पहली जीत थी क्योंकि जिस उदद्ेश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने संघशZ किया, वह पूरा हो गया। अछूतों को भी वे अधिकार प्राप्त हो गए थे जो सवणोZ को प्राप्त थे।
ऐसा ही चाहते थे डां0 अम्बेडकर और उन्होने जो चाहा था वह उन्हें मिल गया। उस दिन उनसे हजारों नहीं लाखों दलित लोग मिलने आए। डां0 साहब सभी से गले मिले। कोई ऐसा अछूत नहीं था जिसने डां0 साहब से मिलकर अपना हदय नहीं जोड़ा था। परन्तु डां0 साहब थे कि उनकी आंखों में आंसू छलछला आए थे। कुछ लोगों ने कहा - वे पे्रम के आंसू थे, और कुछ बोले वे विजय के आंसू थे।
20 सितम्बर , 1932 को गांधी ने भूख हड़ताल कर दी। इससे सारा देश चिन्ता में डूब गया । बात छोटी थी और बड़ी भी। सचमुच यह बिडम्बना थी कि गांधी जैसे महापुरूश जो अछूतों और दलितों में उत्थान का कार्य कर रहे थे, वे भी अछूतों को अलग प्रतिनिधित्व की खिलाफत कर रहे थे।
इतना हि नहीं, उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमन्त्री को धमकी भरा पत्र भी लिखा- यदि अछूतों के उक्त अधिकार जा ब्रिटिश प्रधानमन्त्री ने दिये है, वापस नहीं लिये गए तो मैं तब तक अनशन करता रहूंगा जब तक उक्त अधिकार वापस नहीं लिए जाते।
परन्तु डां0 साहब अपने विचारों पर दृढ़ थे। उन्होंने अपार जनता के सामने दो दूक शैली में सिंह की सी गर्जना करते हुए कहा गांधी जी के प्राणों को बचाने की हर सम्भव कोिशश की जानी चाहिए। पर मुझसे यह आशा न रखी जाए कि मैं दलितों और अछूतों के हित को छोड़ दूंगा। गांधी को अपनी बात याद करनी चाहिए। पूना समझौते में उन्होने स्वयं अछूतों को अलग से प्रतिनिधित्व दिए जाने का समर्थन किया था, फिर यह विरोध क्यों किया जा रहा हैर्षोर्षो अलग से प्रतिनिधित्व मिल जाने पर सारे अछूत हिन्दू धर्म के अडग ही नहीं बने रहेगे, इसमें जरा सी भी शंका करने की बात नहीं।
डां0 अम्बेडकर के शब्द बिल्कुल स्पश्ट थे। परन्तु कांग्रेसी नेताओं को नहीं जंच रहे थे। वे गांधी के मन की बात न समझौते हुए भी उनके स्वर से स्वर मिलाना चाहते थें अत: 20 सितम्बर 1932 को एक घिनौने नाटक खेलने का प्रसास किया गया। यह दिखाने का प्रयास किया गया कि गांधी और कांग्रेस को अलग से अछूतों के लिए प्रतिनिधित्व देने पर आपत्ति है। पर सुरक्षित स्थान देने पर तैयार है।
डां0 अम्बेडकर के एक विश्वसनीय व्यक्ति ने यह खबर डां0 साहब तक पहुंचाई। सुनकर डां0 साहब के कनपटे लाल हो गये। उन्होंने हुंकार भरते हुए कहा`- इस नाटक का चाहे में खलनायक समझा जाऊं, लेकिन जिस बात को मैं अछूतों के हित में समझता हूं। उससे टस से मस नहीं हो सकता। उसे मैं नहीं छोड़ सकता।
घड़ी बहुत निकट थी। स्थिति ऐसे मोड़ पर आकर खड़ी हो गई थी जिसे बहुत नाजुक कहा जा सकता था। अब चारों ओर से गांधी जी के प्राणों की रक्षा के लिए डां0 साहब पर दबाव डाला जाने लगा। डां0 साहब बडे़ धर्म संकट में पड़ गए- जिन अछूतों के हित के लिए उन्होंने इतना बड़ा काम किया है, उसे वे अपने हाथों किसी प्रकार वापस लेर्षोर्षो यदि वे देर करते है तो गांधी के प्राण संकट में पड़ सकते हैर्षोर्षो
देश में एक प्रकार से दोहरा शासन होने लगा । महाराश्ट्र में तो कांग्रेसी और अंग्रेजी शासकों के कारण मिल मालिक मजदूरों पर अत्याचार करने लगे। मजदूरों ने इसके विरोध में जगह-जगह पर गोिश्ठयां कीं, परन्तु उनकी सुनने वाला कौन था र्षोर्षो अन्त में वे डां0 अम्बेडकर की शरण में पहुंचे । मजदूरों ने उनसे कहा- डाक्टर साहब , ये अंग्रेज और कांग्रेसी तो हमें मिटाकर छोडेंगे। हमारे ऊपर अत्याचार , शोशण और दमन के कोडे बरसते जा रहे है। आप मिल मालिकों के विरूद्ध कदम उठाइये। हम सब आपके साथ है।
मिलों में कुछ पद ऐसे थे जिन पर अछूतों की नियुक्ति नहीं हो पाती थी। इतना ही नहीं अछूतों को रेलवे-स्टेशन पर कुली तक बनने नहीं दिया जाता था। यदि कोई अछूत सामान उठाता पाया जाता था तो उसकी खाल उधेड़ दी जाती थी। उसे दो-दो बून्द पानी तक के लिए तरसाया जाता था।
एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा जब अछूत कहे जाने वाले व्यक्ति ऊंची कुर्सी पर बैठेगें और सवर्ण उनकी बातों को स्वीकार करेंगे। कौन कहता है कि अछूत का पलड़ा कमजोर हेर्षोर्षो कौन नहीं जानता है कि जिन्हें हम अछूत कहते है वे हमारे ही अंग हैर्षोर्षो क्या कोई अपने शरीर से किसी एक अंग को काटकर फेंक देता है र्षोर्षो जातीयता की उनकी परिकल्पना बड़ी विराट थी।
जब कभी डां0 अम्बेडकर अछूतों और दलितों की बात करते थे तो सवर्ण हिन्दूओं की आंखों से चिनगारियां छूटने लगती थी। वे ढेले उठाते और डां0 साहब की ओर उछाल देते थे। उस घायल अवस्था में भी डां0 अम्बेडकर साहब के मुंह से कराह नहीं फूटती थी। उलटे वे उनसे कहते थे- `इन पत्थरों में मेरी नहीं तुम्हारी पराजय छिपी हुई है। जिन पत्थरों से तुम मुझे घायल कर रहे हो, एक दिन उन्हीं को उठाकर आंखों से लगाओगे।
डां0 साहब ने ऐसे समय में अपना संघशZ शुरू किया था, जब अछूतोद्वार की सारी संभावनाये समाप्त हो चुकी थी। बड़ों-बड़ों के पैर डगमगाने लगे थे। विश्वास टूटकर आकाश में चला गया था और साहस धरती में गढ चुका था। परन्तु यह डाक्टर अम्बेडकर ही थे, जिन्होंने कांटेदार झांड़ियों , अडंगेदार मार्गो और बड़ी-बड़ी अडचनों को पार किया । वह अछूतों के अधिकारों की मशाल लेकर आगे ही बढ़ते रहे। इस मशाल से उन्होंने अछूतों के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक और शैक्षिक दीपों को प्रज्वलित किया। जिस समय वे दीप से दीप जलाते थे तो लोग उनकी लगन और भक्ति को तोज्जुब से देखते थे। उनके जलाए हुए दीपक आज तक जल रहे हैं, लोगों के हदयों में तो रोशनी जल रही हैं, बड़े-बडे़ नेतागण भी उस प्रकाश को बुझाने का साहस नहीं कर सके हैं।
किसी समय करोड़ों की संख्या में ये धरती पुत्र बस्ती से बाहर टूटी फूटी झोंपड़ियों में दु:ख से भरपूर नारकीय जीवन बिताते थे। अधिक मेहनत के बाद भी उन्हें दो जून भरपेट रोटी और साग नसीब नहीं होता था।
उन्हें कदम-कदम पर प्रताड़ना , उत्पीडन, दुत्कार और तिरश्कार मिलता था। उनकों दबी हुई, कुचली हुई अमानवीय जिन्दगी बितानी पड़ती थी। पति दिन भर मेहनत करने के बाद झोंपड़ी में घुसता तो उसे पता चलता कि पत्नी जमीन्दार के घर जूठन बटोरने गई है। उसका बालक िढबरी की धुआं भरी रोशनी में भूखा पड़ा होता। झोंपड़ी में मिट्टी का एक घड़ा , अलुमिनियम के दो चार बर्तन, टूटी-फूटी एक अदद खाट- यही सब धरोहर दिखाई देती, उस मजदूर को , जो दिनभर खून पसीना बहाकर घर में घुसता था। कभी-कभी तो उस दलित को , इससे भी कठिन परीक्षा का सामना करना पड़ता। वह अपने तीन चार वशZ के बेटे से पूछता- ` मां कहां गई तेरी र्षोर्षो बेटा जबाव देता-` जमीन्दार उसे उठाकर ले गया है।´
 जब बात पुन: शूद्रों पर आ गई है तो मैं यही कहना चाहता हूंं कि शूद्र आर्यो की जाति से हैं। किसी समय में आर्य जाति में तीन वर्णव थे- ब्राहमण, क्षत्रिय और वैश्व। शूद्रों का चौथा वर्ण नहीं था। वे भारतीय आर्यो के क्षत्रिय वर्ण के आर्य थे। शूद्रों और ब्राहमण में बराबर लड़ाई रही और ब्राहमणों पर शूद्रों ने बहुत अत्याचार किए। ब्राहमणों ने शूद्रों के अत्याचार से तंग आकर और द्वेश भाव से शूद्र क्षत्रि-यत्व से गिरकर वैश्व वर्ण के नीचे एक चौथा वर्ण बन गया। इस सिद्वान्त पर विद्वानों के मत की उपेक्षा करनी चाहिए। यह सिद्वान्त मेरा मौखिक है और प्रचलित सिद्वान्त के विरोध में है। मेरा सिद्वान्त कहां तक ठीक है, यह उन पर निर्भर है जो विशय पर निर्णय कर सकते हैं। यदि समालोचक सच्चा है तो मुझे आशा है कि मेरा मत मान लेगा। कम से कम यह सच्चा कहेगा कि यह नया दृिश्टकोण है।